अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़, आईएमए उपाध्यक्ष समेत छह गिरफ्तार

कानपुर। शहर में पिछले दो वर्षों से सक्रिय अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है। इस गिरोह के तार विदेशों तक जुड़े होने की बात सामने आई है। पुलिस के अनुसार, गिरोह अब तक 50 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट कर चुका है।

मामले का खुलासा 29 मार्च को हुआ, जब कल्याणपुर स्थित आहूजा हॉस्पिटल में एक संदिग्ध ट्रांसप्लांट की सूचना पर पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने छापा मारा। जांच में अनियमितताएं मिलने के बाद पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ।

कार्रवाई के दौरान इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) कानपुर की उपाध्यक्ष डॉ. प्रीति आहूजा, उनके पति डॉ. सुरजीत आहूजा, दलाल शिवम अग्रवाल और तीन अस्पताल संचालकों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। पुलिस ने कुल 15 आरोपियों के खिलाफ मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

विदेशी मरीजों तक पहुंचा नेटवर्क

जांच में सामने आया है कि 3 मार्च को इसी अस्पताल में दक्षिण अफ्रीका की एक महिला का भी अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किया गया था। गिरोह गरीब लोगों को पैसों का लालच देकर उनकी किडनी 5 से 10 लाख रुपये में खरीदता था और अमीर मरीजों को 60 लाख से एक करोड़ रुपये तक में बेचता था।

फर्जी दस्तावेजों से करते थे खेल

पुलिस के मुताबिक, किडनी देने वाले और लेने वाले को फर्जी बीमारी दिखाकर अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया जाता था। हालिया मामले में डोनर बिहार का छात्र आयुष और रिसीवर मुजफ्फरनगर की पारुल तोमर थीं। दोनों को गॉल ब्लैडर की बीमारी बताकर भर्ती किया गया था।

नोएडा से आती थी डॉक्टरों की टीम

ट्रांसप्लांट करने के लिए नोएडा से डॉक्टरों की टीम बुलाई जाती थी, जिसमें डॉ. रोहित, डॉ. अफजाल, डॉ. वैभव और डॉ. अनुराग शामिल बताए जा रहे हैं। ये सभी आरोपी फिलहाल फरार हैं और उनकी तलाश में पुलिस की टीमें दिल्ली-एनसीआर में दबिश दे रही हैं। गिरोह के सदस्य आपस में टेलीग्राम के जरिए संपर्क में रहते थे।

स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई

स्वास्थ्य विभाग ने मेडलाइफ हॉस्पिटल को सील कर दिया है, जबकि आहूजा और प्रिया हॉस्पिटल को बंद करने के नोटिस जारी किए गए हैं। हालांकि जांच के दौरान कुछ अस्पतालों में गतिविधियां जारी मिलने से विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

कड़ी सजा का प्रावधान

आरोपियों पर मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। दोषी पाए जाने पर उन्हें 10 साल तक की सजा और एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। साथ ही, मेडिकल पेशे से जुड़े आरोपियों के लाइसेंस भी रद्द किए जा सकते हैं।

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